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Monday, June 07, 2010

बुद्धि जीवी की जय हो


हाँ मैं बुद्धि-जीवी हूँ, पर इसमें गलती मेरी नहीं. कुछ ऐसा ही कहा मेरे एक जानकार मित्र ने जब हमारी किसी छोटी सी बात पर कहा-सुनी हो गयी।

यूँ तो बुद्धि जीवी होने में कोई बुराई नहीं पर बात यह है की बुद्धि जीवी
को अक्सर लोग कुछ अलग ही नज़रिए से देखते हैं। जी हाँ, बुद्धिजीवी वे लोग हैं जिन्हें सामान्य भाषा में इंटेलेक्चुअल भी कहा जाता है। चेहरे से शुशील और सरल दिखने वाले यह लोग भेजे से टेढ़े किस्म के होते हैं जिसके कारण कभी कभी उपहास के पात्र भी बन जाते हैं। पर कभी कभी आम इंसान इनसे डर के भीचलता है, न जाने कब क्या कह बैठें और फिर बेचारा आम आदमी अपनी खोपडिया खुजाने के आलावा कुछ नहीं कर पाएगा।

पर
शायद वास्तविकता तो कुछ और ही है, क्यूंकि बुद्धिजीवी भी कई प्रकार और आकर के होते हैं। एक किस्म तो उन बुद्धि जीवियों की होती है जिनके पास उधार की बुद्धि है और वे दूसरों को उस उधार की बुद्धि में से दिल खोल के बुद्धि बांटते फिरते हैं या यूँ कहें वाह वही बटोरने के लिए ज़बरदस्ती ही बुद्धि चेपते फिरते हैं।

दूसरी किस्म वे हैं जिनका जीवन बुद्धि को मोटी-मोटी किताबों और महापुरुषों के सत्संग रुपी ज्ञान द्वारा घिसने और उसको तेलपिलाने में गुज़र जाता है। ऐसे बुद्धि जीवी अपनी फौलाद सी बुद्धि का प्रयोग करके लोगों एवं समाज का उद्धार करने का प्रयत्न ही करते रहते हैं।

तीसरे वह धूर्त पापी हैं जो बुद्धि जीवियों की ही बुद्धि का जन प्रसारण
करके अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं। मतलब बुद्धि-बाज़ार के सबसे बड़े थोक के भाव विक्रेता यही जनाब हैं। आय दिन बुद्धि की प्रदर्शनी भी लगाते हैं और खूब पैसा कमाते हैं।

इन तीनो को यदि एक मंच पर उतार दिया गया तो ज्ञान की गंगा, जमुना और सरस्वती एक ही मंच पे से फूट पडेंगी। पर गौर से देखा जाये तो इन सब में पिसता आम आदमी ही है। बिना बात के ज्ञान की सहस्त्र धाराओं में स्नान करना पड़ता है और कभी कभी तो चाहते हुए डुबकी और गहरे गोते भी लगाने पड़ते है।

एक बार तो आम आदमी ने पूछ ही लिया , अरे भाई बुद्धि जीवी एक बात तो बताओ - तुम इतना सोच कैसे लेते हो? तो बुद्धिजीवी ने अपने मुख-मंडल पे विचित्र और गहरी चिंतन की रेखा खेंचते हुए विनम्र भाव से कहा की महोदय -

कलियुग में जैसे हर घर की ज़रूरत टी-वी और बीवी है,
इस समाज की ज़रूरत हम बुद्धि-जीवी है।
सोचना हमारे बाएँ हाथ का खेल है,
हमारे हर शब्द में छुपी एक रहेस्य की रेल है।

जनता जनार्दन तो आप हैं,
पर बुद्धि के मामले में हम सबके बाप हैं।
न देता कोई हमको चुनौती है,
क्यूंकि सोचना तो भाई हमारी बपोती है।

ज्ञान विज्ञानं के दर्शन भी हम कराते हैं,
पर हम फ़ोकट में किसी को नहीं पकाते हैं।
न समझना हमको किसी से भी कम,
क्यूंकि बुद्धि जीवी हैं हम, बुद्धि जीवी हैं हम, बुद्धि जीवी हैं हम।।

वैसे तो बुद्धि जीवी के बारे में जितना भी कहो कम है, यह साधारण से काम को अपनी बुद्धि के बल पर असाधारण सा दिखा देते हैं और फिर वह काम और बात खास हो जाती है। पर प्रश्न यह है की क्या वाकई समाज को इन जैसे बुद्धि जीवियों की आवश्यकता है? मैं नहीं जानता और न ही इसके बारे में सोचना चाहता हूँ क्यूंकि सोचना तो बुद्धि जीवी का काम है। पर मेरी मानिए तो एक साधारण इंसान बल्कि हर इंसान के लिए सरल होना बहुत ज़रूरी है क्यूंकि उसी में उसका असली अस्तित्व छुपा है।

6 comments:

pankaj mishra said...

जय जय जय हो महाराज। बहुत खूब।

http://udbhavna.blogspot.com/

डा० अमर कुमार said...


जी, उपस्थित श्रीमान !
मैं एक अल्पकालिक प्रशिक्षु बुड्ढीजीवी !


मॉडरेशन के बावज़ूद आने के लिये क्षमा ।
भविष्य में यह न दोहराया जायेगा, श्रीमान !

Udan Tashtari said...

बहुत सटीक!!

कलियुग में जैसे हर घर की ज़रूरत टी-वी और बीवी है,
इस समाज की ज़रूरत हम बुद्धि-जीवी है।


-बस!

AKHRAN DA VANZARA said...

जय हो ...

Rajesh R. Singh said...

भाई बधाई हो..... क्या खूब लिख मारा है बिलकुल सही है... मूर्खों की जमात में बुद्धिजीवियों का क्या काम ?

SKT said...

दुनिया के बुद्धिजीवियों एक हो!