दिवाली की शुभकामनाएं
Saturday, October 17, 2009 लेखक Piyush Aggarwal
फर्क सिर्फ़ प्यार का है
Monday, August 31, 2009 लेखक Piyush Aggarwal

फर्क सिर्फ़ प्यार का है,
ज़ंग और अमन में, आंसू और हँसी में
फर्क सिर्फ़ प्यार का है।
रिश्तों की दूरी, अजनबी की करीबी
में फर्क सिर्फ़ प्यार का है।
अनसुनी धड़कन, और दीवाने हुए मन में
फर्क सिर्फ़ प्यार का है।
नहाए खेतों और तपती रेत में,
फर्क सिर्फ़ प्यार का है।
सूरज की गर्मी और चाँद की नरमी में
फर्क सिर्फ़ प्यार का है।
अनसुलझे सवाल और एक खूबसूरत जवाब में,
फर्क सिर्फ़ प्यार का है।
तुझमें, मुझमें, और हम सब में,
फर्क सिर्फ़ प्यार का है।
चाचा छक्कन की दिलचस्प दास्ताँ - भाग ३
Tuesday, August 25, 2009 लेखक Piyush Aggarwal
कोई है? अनुराग? अरे शीतल? शन्नो? पता नहीं पौ फट ते ( सुबह सुबह ) ही सब कहाँ गायब हो गए? यह कमबख्त कुमारी बहिन भी बाज़ार गई हुई है। बोला था की नौकर को मेरे पास छोड़ जाओ पर बड़ी माँ के जाने के बाद यहाँ मेरी कौन सुनता है। बूढा जो हो गया हूँ, वैसे भी अब न राज रहा न वोह शान-ओ-शौकत , पर चांदनी चौक में आज भी हमारा वोही रुतबा है जो राय साहब दिन दयाल के ज़माने में था। अब यह आजकल के नौजवान क्या समझेंगे शाही बातों को? इनको तोह वोह क्या कहते हैं सनेमा में जाने से ही फुर्सत नहीं मिलती। हम ठहरे पुराने शाही ख़यालात के लोग। अब हमारे साथ समय बिताने के लिए भी इनके पास समय नहीं। अभी जो हमारे पिताजी यहाँ होते तोह एक एक की टंगे तुड़वा देते।
खैर जो भी कहो घर में सब मुझे बड़ा प्यार करतें हैं, जानता हूँ की मेरे कड़क रवय्ये के कारण कई बार घर में मन मुटाव पैदा हो गया था पर मैंने कभी भी अपनी बात को मनवाने के लिए ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं की। हाँ मलाल बस एक बात का है की कुमारी बहिन के साथ जो कुछ हुआ उसका जिम्मेदार मैं ही हूँ। काश उस वक्त माँ को उनके पैरों में पड़ के चुप करा दिया होता जब उन्होंने वसुंधरा के होने पर कुमारी बहिन को घर से निकालने के लिए खुदकुशी करने की धमकी दे डाली थी। लो कुमारी बहिन भी बाज़ार से वापस आ गई, ज़रूर खाने को कुछ लायी होगी।
कुमारी बहिन: आपको कितनी बार मना किया है की इतना हुक्का मत पिया करो पर तुमने कभी मेरी सुनी हो तोह कहने का फायदा भी है। इस घर में रहते मुझे ३५ साल हो गए हैं, पर मेरी हालत इस घर में किसी पुराने शाही सोफे से जादा नहीं है। शाही इसलिए क्यूंकि कहने को अब भी पुरानी दिल्ली के सबसे मशहूर परिवार की बड़ी बहु हूँ पर अब इस दकियानूसी शान को और खेंच पाना मेरे बस की बात नहीं।
चाचा: उफ़ हो , तुम तोह जब देखो तीसरे विश्व युद्घ के लिए तैयार खड़ी रहती हो, कभी दो शब्द मीठे बोल लोगी तोह तुम्हारा क्या चला जाएगा।
कुमारी बहिन: डाक्टर साहेब ने तुम्हे मीठा देने को सख्त मन किया है, और तोह और तुम्हारी प्यारी शन्नो ने तोह तुम्हे इस ज़िन्दगी में मीठा न दिखाने की कसम खा रक्खी है।
चाचा: तुम सबने तोह मुझे जीते जी मारने की मानो ठान रक्खी है। कामिनी शादी होकर क्या गई मेरा तोह सुख चैन ही चला गया।
कुमारी बहिन : हाँ हाँ जानती हूँ, तुमने तोह साड़ी दुनिया को ही अपना दुश्मन मान रखा है, कभी कभी उस दिन को कोसती हूँ जब तुमसे पहली बार मिली थी। काश उस दिन मेरे बाबा मुझे बरसाने से मथुरा न लाये होते।

(होली का दिन) मथुरा में लठ मार होली कई सौ साल से मनाई जा रही है, मैं और मेरी सहेलियां उस दिन उसी के लिए मथुरा जा रही थी। हम सबका एक ही लक्ष्य था , कान्हा के दल की जम के पिटाई, माँ बताती थी की कैसे इसी दिन अपने कृष्ण मतलब बाबा से मुलाकात हुई। वैसे राधा कृष्ण की इस मनमोहक नगरी में न जाने कितनी अनगिनत प्रेम कहानियाँ लिखी गई हैं। अपने जीवन में मैंने ख़ुद अनेक यात्रियों को वृन्दावन मथुरा बरसाने के प्रेम में डूब कर ख़ुद को भुलाते और नटखट नन्दलाल के प्रेम में बावरे होकर गली गली भटकते देखा है। उसका माखन चोर का मोह ही कुछ ऐसा है की आप अपने आप और अपनी ज़िन्दगी को भुला उसी के प्रेम में डूब जाना पसंद करते हैं। उसके बाद ब्रह्माण्ड का राज भी आपको फीका मालूम पड़ता है। उस परम आनंद का अनुभव बहुत ही किस्मत वालों को मिलता है। इसीलिए प्रेम के भूके यात्री जो मथुरा वृन्दावन आते हैं, वे राधा रानी के दर्शन को बरसाने अवश्य ही जाते हैं । हमारे गाँव में यह हमेशा से कहा गया की कृष्ण को पाने का रास्ता राधा रानी के गाँव से होकर ही जाता है।
हर साल की तरह मैं और मेरी सहेलियां ग्वाल बालन के साथ होली खेलने को मथुरा के लिए रवाना हो गई। मार्ग में लोगों का उत्साह पिछले कई सालों से जादा ही था । हम सब सहेलियों ने इस बार अपने अपने लठ को खूब तेल पिला के रखा था और सब ग्वाल बालन को खूब पिटाई करने के मन से ही घर से निकली थी। वैसे तोह लठ मार होली दुनिया भर में मशहूर है पर इसके पीछे छिपा एक अनोखा प्यार बहुत ही कम लोग समझ पाते हैं।
लो रंग में हुर्दंग मचाते ग्वालों की पहली टोली दिखाई दी। जुबान पे सिर्फ़ उसी नन्दलाल का नाम, न जाने कैसा जादू कर दिया है की लठ की मार के बाद भी चेहरे पे कोई शिकन नहीं बल्कि प्रेम रंग में डूबे दीवाने की तरह फ़िर लठ के नीचे आने की ललक दिखाई पड़ती है। भगवान ही बचाए इन दीवानों से अब तोह। बरसाने की सभी टोलियाँ वृन्दावन - मथुरा पहुँच चुकी थी और कुछ ही देर में प्रेम और रंग का ऐसा अनोखा एवं मनोहर संगम होने वाला था जिस दृश्य की सिर्फ़ कल्पना ही की जा सकती है। हमारे वहां पहुँचते ही कुछ ही देर में सारे आकाश में से रंगों की एक आंधी चल पड़ी और शरीर की हर थकन को कुछ ही पलों में उड़ा के ले गई।
रंगों में नहाती वृन्दावन की गलियों से गुज़रते हुए हम वहां पहुँच गए जहाँ लठ मार होली खेली जा रही थी। ग्वाल बालन के दल कमर कस के खड़े थे और जैसे ही उन्होंने हमें छेड़ना शुरू किया सभी ने अपने लठ को निकला और पिटाई शुरू कर दी। अपने को बचाते ग्वाल बालन ने ब्रज गीत के ज़रिये हमें छेड़ना बंद नहीं किया। उनकी देखा देखि हमने भी गीत गाने शुरू कर दिए।
अरी भागो री भागो री गोरी भागो, रंग लायो नन्द को लाल।
बाके कमर में बंसी लटक रही और मोर मुकुटिया चमक रही
संग लायो ढेर गुलाल, अरी भागो री भागो री गोरी भागो,रंग लायो नन्द को लाल।
चारों तरफ़ से रंग ही रंग बरस रहा था, ब्रज के ग्वाल बालन के गीतों की गूँज आज इन्द्र के सिंघासन को हिलाने के लिए काफ़ी थी। ऐसे में दिल को काबू कर पाना किसी भी इंसान के लिए कठिन है।
हाथों में लठ लिए मैं भी इस रंगों की बारिश का आनंद लेने को कूद पड़ी। लठ बरसाती , गीत गाती , प्रेम और खुशी के अश्रु गिराती, ख़ुद को भूलती, नन्द के लाल से एक पल शर्माती, रूठ जाती और फ़िर उसे प्रेम पूर्वक मनाती। एक पल को ऐसा लगा की काश इसी रूठने और मनाने में जीवन बीत जाए। कुछ देर के बाद वोह रंग का तूफ़ान तो ठहर गया पर मेरे दिल में एक और तूफ़ान खड़ा कर गया - इस बार शायद वोह तूफ़ान मेरे भीतर ही आया था।
उसने एक पल को देखा और मेरी साँस रुक गई। उसके शीतल स्पर्श को जीवन भर नहीं भुला सकी। ऐ सखी कौन है वोह ? कहाँ चल दिया, पल भर में, मेरी धडकनों , मेरे सपनों को अपने पीछे लिए। मैं बावरी होकर उसके पीछे भागी जा रही थी, न परिवार, न समाज और ख़ुद को भी भुलाये बस सिर्फ़ एक ही इच्छा दिल में लिए , रुक जाओ सिर्फ़ एक पल के लिए ही सही, रुक जाओ। उसको रंग के गुब्बारे के बीच गायब होता देख मैं चिल्ला उठी यह सोचकर की शायद अब फ़िर कभी न देख पाऊँ उसे इस जीवन में। टूटती साँसों ने एक आखिरी पुकार लगायी - रुको रुको रुको
और फ़िर
प्रेम की परिभाषा
Monday, August 24, 2009 लेखक Piyush Aggarwal

एक जवान रात चांदनी से पूछ बैठी,
क्या चाँद तुम्हे मुझसे अधिक प्रेम करता है?
कुछ पल सोचने के बाद, चांदनी बोली:
की जिस तरह श्री कृष्ण के भीतर राधा
उनके प्राण बनके रहती हैं,
मैं चाँद में उसकी श्वास, धड़कन और आत्मा
बनके रहती हूँ।
और ऐ हसीं रात तुम वृन्दावन की
वोह मधुर गलियां हो
जो राधा कृष्ण के अटूट प्रेम के
दृश्य को हल पल महसूस कर रही हैं,
तुम जमुना का वोह किनारा हो
जहाँ देवताओं ने राधा-कृष्ण की
चरण वंदना की थी,
तुम मीराबाई हो जो श्री कृष्ण
के प्रेम में बावरी होकर
सारे ब्रह्माण्ड में भटकती हो।
तुम सत्य हो।
ऐ हसीं सुहानी रात, तुम धन्य हो!
Labels: कविता, प्रेम, हिन्दी कविता 7 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
मुश्किल है
Friday, August 21, 2009 लेखक Piyush Aggarwal
उस नमी को भूल पाना मुश्किल है ,
उस हँसी को भूल पाना मुश्किल है,
बारिशों में भीगी तेरी धडकनों को
भूल पाना मुश्किल है।
खामोशी में कही वोह हर बात याद है,
उस कमरे से खिसकती वोह रात भी याद है,
नशे में अभी तक हूँ शायद,
इसलिए पिछली सर्दियों की
हर मुलाकात मुझे याद है।
मेरे छूने का कुछ तोह एहसास हुआ होगा तुझको,
क्या इस दीवाने की कभी याद न आई तुझको,
स्वप्न में ही सही
पर वोह दीवानगी भुला पाना मुश्किल है।
उस नमी को भूल पाना मुश्किल है,
तेरी भीगी धड़कनें भुला पाना मुश्किल है..
चाचा छक्कन की दिलचस्प दास्ताँ - पार्ट २ ( पहला भाग )
Monday, August 17, 2009 लेखक Piyush Aggarwal
वैसे तोह गोकुल दास जी के परिवार का हमारे यहाँ बचपन से आना जाना था पर शायद यह पहली बार हम उनके घर होली मानाने जा रहे थे। इतने वर्षों में हमने जादातर होली अपनी हवेली में ही मनाई थी, बाबा के सख्त निर्देश थे की कोई भी व्यक्ति हवेली के बहार जाकर होली नहीं मनायेगा। जो लोग बाबा को गुलाल लगाने आते, वे ही हम सबको थोड़ा सा रंग लगा जाते। वोह तोह जब हम कालेज में आए तोह माँ के जिद्द करने पे उन्होंने मुझे अपने दोस्तों के साथ कुछ घंटों के लिए बाहर होली मनाने की मंजूरी दे दी। यूँ तोह होली पे पुरानी दिल्ली में भी हुल्लड़बाजी कम नहीं होती, सुबह से ही सब छतों पे खड़े लोग रंगों की बाल्टी लिए हर आने जाने वाले का स्वागत करने को तैयार रहते हैं। हर नुक्कड़ पे रंंगे हुए लड़के- लड़कियों की फौज आपको भिगोने की साजिश में तैनात रहती है। और फ़िर वोह चोराहों पे गरमा गर्म समोसे, जलेबी और गुजिया की सुगंध तोह किसी को भी बेहोशी के आलम से उठाने के लिए काफ़ी है। इन सब के बाद भी मथुरा की होली देखने की उत्सुकता हमेशा से मेरे दिल में रही।
हम होली से तीन दिन पहले ही गोकुल दास जी के यहाँ पहुँच गए। गोकुल दास जी के घर में सभी ने हम सबसे बड़े ही प्रेम के साथ बात की। मानना पड़ेगा की दिल जीतना तोह कोई ब्रज के लोगों से सीखे। होली से दो दिन पहले पहुंचकर हमने गोकुल दास जी के लड़कों के साथ खूब धमाल मचाने की तय्यारी में जुट गए। तरह तरह के रंग तैयार करना, आँगन में तालाब की सफाई करवाना, और तोह और ताज़ा गोबर का भी प्रबंध हो चुका था। बस अब तोह इंतज़ार था मथुरा की गोपियों को रंगने का।
आख़िर वोह दिन आ ही गया जिस दिन पूरा देश वृन्दावन और मथुरा की ताल पे थिरक उठता है। ब्रज के रन बाँकुरे सुबह से ही तय्यारी में लगे हुए थे की आज तोह हर आने जाने वाली छोरी को बिना रंंगे नहीं जाने देंगे।
होली के दिन , कृष्ण की नगरी में रंग और प्रेम के इस कुम्भ को देखने के लिए हजारों लोगों की भीड़ उमड पड़ी थी। पुरानी दिल्ली में हमने कई बार झाकियां देखि थी पर आत्मा को छू देने वाले उस मंज़र के बारे में कभी कल्पना भी नहीं की थी। कृष्ण के प्रेम में नाचते हुए युवक युवतियां, लाल, हरे, पीले, गुलाबी, हर रंग में सराबोर वृन्दावन की गलियां, और बांके बिहारी की एक झलक को बेताब हर में नज़र। यह दृश्य देवताओं को भी मानव रूप लेने को मजबूर कर सकता था। पर इसी बीच में मैं नहीं जानता था की मथुरा नगरी में आकर मैं उस शक्स से मिलूंगा जिससे मेरे आने वाले जीवन का रुख ही बदल जाएगा।
आगे का अगले अंश में..


