चंद लम्हों पहले
एक मासूम दिल से मुलाकात हुई है,
कई दिन बाद आज खुद से कुछ बात हुई है।
दिल की साफ़ है यह जानता हूँ मैं,
उसकी अनसुनी धडकनें पहचानता हूँ मैं।
पहेली तो नहीं लगती,
वह चुलबुली बातें उसकी,
खिंचा जा रहा हूँ एक डोर से,
यह मानता हूँ मैं।
कुछ तो बात है जो चेहरे पे
मुस्कान खिली हुई है,
चंद लम्हों पहले,
एक मासूम दिल से मुलाकात हुई है।
कहना चाहता हूँ उस मुसाफिर से
दो पल ठहर जाने को,
अपने दिल के किसी कोने में,
एक कोना दे दे इस दीवाने को।
चंद लम्हों पहले
एक मासूम दिल से मुलाकात हुई है,
कई दिन बाद आज खुद से कुछ बात हुई है।
जीवन के अनमोल रंग
पियूष अग्रवाल द्वारा रचित जीवन के अनमोल रंग एक प्रयास है जीवन के उन रंगों को उभारने का जिन्हें हम आम तौर पे नज़र अंदाज़ कर देते हैं
Sunday, January 23, 2011
Friday, January 21, 2011
शुरुआत
सुबह सुबह एक नयी सुबह की शुरुआत करें,
आओ एक बार फिर शुरू से शुरुआत करें,
चलो साथ में ही कुछ मिलके शुरुआत करें,
आओ कुछ शुरू करने की शुरुआत करें।
शुरुआत करना आसान तो नहीं,
पर शुरुआत करने में हर्ज़ भी नहीं,
शुरुआत करके देखें तो ज़रा,
क्यूंकि पिछली शरुआत से दिल नहीं भरा।
जो शुरू हुआ तो न थमेगा यह सिलसिला,
चुपके से देगा यह शुरू करने का हौंसला,
अब ले ही चुके हो शुरू करने का फैसला,
तो शुरू करने में अब कैसी देर भला।
जानता हूँ की तुम शुरुआत करने से डरते हो,
पर फिर भी हर बार शुरू तुम ही करते हो,
पर जब मैं शुरू से शुरू करता हूँ,
तुम अपनी हर शुरुआत से मुकरते हो।
खैर छोडो अब पुरानी बातों को क्यूँ याद करें,
थामें हाथ और एक बार फिर शुरू से शुरुआत करें,
शुरू करके हम तुम देखेंगे माजरा,
बिना शुरुआत आखिर क्यूँ वक़्त बर्बाद करें।
सुबह सुबह एक नयी सुबह की शुरुआत करें,
आओ एक बार फिर शुरू से शुरुआत करें।
आओ एक बार फिर शुरू से शुरुआत करें,
चलो साथ में ही कुछ मिलके शुरुआत करें,
आओ कुछ शुरू करने की शुरुआत करें।
शुरुआत करना आसान तो नहीं,
पर शुरुआत करने में हर्ज़ भी नहीं,
शुरुआत करके देखें तो ज़रा,
क्यूंकि पिछली शरुआत से दिल नहीं भरा।
जो शुरू हुआ तो न थमेगा यह सिलसिला,
चुपके से देगा यह शुरू करने का हौंसला,
अब ले ही चुके हो शुरू करने का फैसला,
तो शुरू करने में अब कैसी देर भला।
जानता हूँ की तुम शुरुआत करने से डरते हो,
पर फिर भी हर बार शुरू तुम ही करते हो,
पर जब मैं शुरू से शुरू करता हूँ,
तुम अपनी हर शुरुआत से मुकरते हो।
खैर छोडो अब पुरानी बातों को क्यूँ याद करें,
थामें हाथ और एक बार फिर शुरू से शुरुआत करें,
शुरू करके हम तुम देखेंगे माजरा,
बिना शुरुआत आखिर क्यूँ वक़्त बर्बाद करें।
सुबह सुबह एक नयी सुबह की शुरुआत करें,
आओ एक बार फिर शुरू से शुरुआत करें।
Sunday, January 16, 2011
कुछ दीवानापन अब भी बाकी है
जी हाँ, कुछ दीवानापन अब भी बाकी है,
इन गुमसुम हैरान नज़रों में कहीं।
सोच में हूँ।
ढून्ढ रहा हूँ उन पंखों को,
बचपन में लगाया करता था।
पर समय के साथ,
उड़ना जान गया हूँ।
यकीं कीजिये,
थोडा दीवानापन अब भी बाकी है।
पूछ के तो देखिये,
इस दीवानेपन की हद क्या है?
हमारा जवाब यही होगा,
डूब के तो देखिये,
हाथ थाम के तो देखिये,
खुद ही जान लोगे,
इस सिरफिरे में थोडा दीवानापन अब भी बाकी है।
देखते हैं कब तक न मानोगे,
हवाओं के थमने तक ही सही,
वक़्त के रुकने तक ही सही,
एक दिन इस दीवाने को पहचानोगे,
वादा है,
ख्वाब में भी न ढून्ढ पाओगे,
क्या करें?
आखिर थोडा दीवानापन अब भी बाकी है।
इन गुमसुम हैरान नज़रों में कहीं।
सोच में हूँ।
ढून्ढ रहा हूँ उन पंखों को,
बचपन में लगाया करता था।
पर समय के साथ,
उड़ना जान गया हूँ।
यकीं कीजिये,
थोडा दीवानापन अब भी बाकी है।
पूछ के तो देखिये,
इस दीवानेपन की हद क्या है?
हमारा जवाब यही होगा,
डूब के तो देखिये,
हाथ थाम के तो देखिये,
खुद ही जान लोगे,
इस सिरफिरे में थोडा दीवानापन अब भी बाकी है।
देखते हैं कब तक न मानोगे,
हवाओं के थमने तक ही सही,
वक़्त के रुकने तक ही सही,
एक दिन इस दीवाने को पहचानोगे,
वादा है,
ख्वाब में भी न ढून्ढ पाओगे,
क्या करें?
आखिर थोडा दीवानापन अब भी बाकी है।
Saturday, October 16, 2010
आखिर ऐसा क्यूँ होता है?
आखिर ऐसा क्यूँ होता है? कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनके उत्तर जानने की इच्छा करना भी समाज में अटपटा माना जाता है। अगर आप दस लोगों के बीच में ऐसे सवाल पूछ लें तो शायद आपको उपहास के सिवा कुछ भी हासिल नहीं होगा। ऐसे ही एक प्रश्न को लेकर उलझा हुआ था तो सोचा की आप लोगों के साथ ही बाँट लूं आखिर आप तो मेरे अपने ही हैं। पिछले चार सालों से निरंतर मेरा होंसला बढ़ा रहे हैं। खैर, बातें तो होती ही रहेंगी पर जिस खास बात के लिए मैं यह लेख लिख रहा हूँ वह तो बता दूं।
तो मुद्दा शुरू कुछ इस तरह से हुआ, हम अपने एक करीबी मित्र से अपने पारिवारिक जीवन में उत्पन्न होने वाली चिंता का ज़िक्र कर रहे थे जो वास्तव में हर इंसान के जीवन में कभी न कभी आती है। जी हाँ यह वह समस्या है जिसके आगे बड़े बड़े तीस मार खां और सूरमा भोपाली अपनी खोपड़ी खुजलाते पाए जाते हैं। आप सोच रहे होंगे क्या मैं तृतीय विश्व युद्ध किसके बीच होगा इसके विषय में तो चर्चा करने जा रहा? वैसे आपकी सोच काफी नजदीक है, यह विषय कुछ वैसा ही है। चलिए और शब्द बर्बाद न करते हुए मैं कह ही देता हूँ, जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ विवाह की। विवाह माने के शादी, क्या आपकी शादी हुई है? क्या कहा नहीं, चलिए तो फिर तो खूब जमेगी जब मिल बैठेंगे कुंवारे दो। वैसे खुशनसीब हैं जो अब तक इस समस्या से आपका पला नहीं पड़ा है। खाड़ी देश का संकट या दक्षिण अफ्रीका में रंग भेद की समस्या से छुटकारा मिल सकता है पर विश्व भर में फैली इस पौराणिक समस्या का हल कोई नहीं। सोचिये अगर श्री राम ने सीता मैय्या से विवाह नहीं किया होता, या फिर गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन को बीच में एक लाइन में ही सही, विवाह नामक समस्या से लड़ने के भी कुछ गुर बता दिए होते तो कितना अच्छा होता। खुद तो नन्दलाल ने सोलह हज़ार शादियाँ कर ली और समस्या आने वाले कई युग तक मुझ जैसे अनगिनत नौजवान झेल रहे हैं। अरे योगिराज यह क्या कर दिया तुमने :(
वैसे मेरे ख्याल से समाज को इस भीषण समस्या प्रदान करने में कई महापुरुषों का योगदान हो सकता है। सिर्फ श्री कृष्ण को दोष देना कुछ ठीक नहीं। हमारा इतिहास तो ऐसी महँ गाथाओं से सराबोर है, एक ढूँढो तोह हज़ार मिलती हैं, अब मुग़ल साम्राज्य को ही ले लीजिये। अरे हुज़ूर, उनके ज़माने में तो एक राजा और उसकी दस पंद्रह रानियाँ होना तो समझो एक फेशन स्टेटमेंट रही होगी। कमबख्त मानो ऊपर से ही रानियों और अपनी औलादों का कामन-वेल्थ समारोह मानाने की तय कर आये हों।
अब आप पूछेंगे मैं खा-म-खा इतिहास की इस नेहर में गोते लगवा रहा हूँ, आखिर मेरा सवाल है क्या?
अरे साहब आप तो बिलकुल भी शान्ति से नहीं बैठ सकते। कम से कम दो पल का सब्र तो कीजिये, वैसे आप और हम तो इस समस्या के भुक्त भोगी होने वाले हैं। मैं तो सिर्फ उन सज्जन या सज्जनी से मिलना चाहता हूँ और उनकी चरण वंदना करना चाहता हूँ जिन्होंने पूरी मानव जाती की बेंड बजवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूं की मेरी समस्या अभी दूर है पर संकट के बादल तो फिर भी मंडरा रहे हैं। कभी कभी बारिश से पहले ही छाता खोल लेना बेहतर है। क्यूँ , मैंने ठीक कहा न?
तो मुद्दा शुरू कुछ इस तरह से हुआ, हम अपने एक करीबी मित्र से अपने पारिवारिक जीवन में उत्पन्न होने वाली चिंता का ज़िक्र कर रहे थे जो वास्तव में हर इंसान के जीवन में कभी न कभी आती है। जी हाँ यह वह समस्या है जिसके आगे बड़े बड़े तीस मार खां और सूरमा भोपाली अपनी खोपड़ी खुजलाते पाए जाते हैं। आप सोच रहे होंगे क्या मैं तृतीय विश्व युद्ध किसके बीच होगा इसके विषय में तो चर्चा करने जा रहा? वैसे आपकी सोच काफी नजदीक है, यह विषय कुछ वैसा ही है। चलिए और शब्द बर्बाद न करते हुए मैं कह ही देता हूँ, जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ विवाह की। विवाह माने के शादी, क्या आपकी शादी हुई है? क्या कहा नहीं, चलिए तो फिर तो खूब जमेगी जब मिल बैठेंगे कुंवारे दो। वैसे खुशनसीब हैं जो अब तक इस समस्या से आपका पला नहीं पड़ा है। खाड़ी देश का संकट या दक्षिण अफ्रीका में रंग भेद की समस्या से छुटकारा मिल सकता है पर विश्व भर में फैली इस पौराणिक समस्या का हल कोई नहीं। सोचिये अगर श्री राम ने सीता मैय्या से विवाह नहीं किया होता, या फिर गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन को बीच में एक लाइन में ही सही, विवाह नामक समस्या से लड़ने के भी कुछ गुर बता दिए होते तो कितना अच्छा होता। खुद तो नन्दलाल ने सोलह हज़ार शादियाँ कर ली और समस्या आने वाले कई युग तक मुझ जैसे अनगिनत नौजवान झेल रहे हैं। अरे योगिराज यह क्या कर दिया तुमने :(
वैसे मेरे ख्याल से समाज को इस भीषण समस्या प्रदान करने में कई महापुरुषों का योगदान हो सकता है। सिर्फ श्री कृष्ण को दोष देना कुछ ठीक नहीं। हमारा इतिहास तो ऐसी महँ गाथाओं से सराबोर है, एक ढूँढो तोह हज़ार मिलती हैं, अब मुग़ल साम्राज्य को ही ले लीजिये। अरे हुज़ूर, उनके ज़माने में तो एक राजा और उसकी दस पंद्रह रानियाँ होना तो समझो एक फेशन स्टेटमेंट रही होगी। कमबख्त मानो ऊपर से ही रानियों और अपनी औलादों का कामन-वेल्थ समारोह मानाने की तय कर आये हों।
अब आप पूछेंगे मैं खा-म-खा इतिहास की इस नेहर में गोते लगवा रहा हूँ, आखिर मेरा सवाल है क्या?
अरे साहब आप तो बिलकुल भी शान्ति से नहीं बैठ सकते। कम से कम दो पल का सब्र तो कीजिये, वैसे आप और हम तो इस समस्या के भुक्त भोगी होने वाले हैं। मैं तो सिर्फ उन सज्जन या सज्जनी से मिलना चाहता हूँ और उनकी चरण वंदना करना चाहता हूँ जिन्होंने पूरी मानव जाती की बेंड बजवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूं की मेरी समस्या अभी दूर है पर संकट के बादल तो फिर भी मंडरा रहे हैं। कभी कभी बारिश से पहले ही छाता खोल लेना बेहतर है। क्यूँ , मैंने ठीक कहा न?
Labels:
जीवन सन्देश,
प्रेम,
राष्ट्र हित,
विवाह,
शादी
| आपके विचार |
Tuesday, August 31, 2010
हम सब चटोरे हैं!
अरे भाई , अब मान भी लीजिये। क्या कहा, नहीं मानोगे? ठीक है, पर सच तो यही है की हम सब (दिल्लीवाले)चटोरे हैं। पर दोस्त इसमें हमारी कोई गलती नहीं। दिल्ली के हर कोने पे बिछे तरह तरह के व्यंजनों के जाल से बच पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो जाता है। बेचारा दिल्ली वाला करे तो क्या करे आखिर दिल तो बच्चा है जी :)खैर समोसे , छोले भठूरे , टिक्की और ढोकले की फ़ौज से तो जैसे तैसे बच भी ले, पर आलू
चाट की बमबारी, और गोल-गप्पों की तोप और कुल्फी रॉकेट लौंचेर के आगे तो बड़े-बड़े ढेर हो जाते हैं। पर समस्या यहीं पर ख़त्म नहीं होती है। जहाँ एक तरफ हम दिल्ली वाले इमारती और जलेबी की गलियों से गुज़रते हुए मोटापे नामक शत्रु के आक्रमण से बचते फिरते हैं वहीँ दूसरी तरफ बिरयानी नगर और नूडल पार्क के दंगे हमें नेस्तनाबूद करने को तैयार खड़े रहते हैं ।
चाट की बमबारी, और गोल-गप्पों की तोप और कुल्फी रॉकेट लौंचेर के आगे तो बड़े-बड़े ढेर हो जाते हैं। पर समस्या यहीं पर ख़त्म नहीं होती है। जहाँ एक तरफ हम दिल्ली वाले इमारती और जलेबी की गलियों से गुज़रते हुए मोटापे नामक शत्रु के आक्रमण से बचते फिरते हैं वहीँ दूसरी तरफ बिरयानी नगर और नूडल पार्क के दंगे हमें नेस्तनाबूद करने को तैयार खड़े रहते हैं ।आखिर बेचारा दिल्ली वाला करे तो क्या करे? उसके पास थक हार के दुश्मन के आगे जीभ टिका देने के आलावा कोई और उपाय नहीं।

पर भाई साहब कमज़ोर दिल वालों को इस जंग के मैदान में आना ही नहीं चाहिए था।
shh चुप रहिये आप, अभी बोल दिया है फिर न कहना , ऐसी बात कहने वाले को हमारी दिल्ली में सज़ा-ऐ-निम्बू पानी दे देते हैं :-) और बड़े पापियों को तो नाथू हलवाई के यहाँ के पकोड़े और रसमलाई से सराबोर किया जाता है। और फिर भी अगर कुछ दम बचे तो उन्हें रोज़ मक्खन में नहाये परांठों का सेवन करने पे मजबूर किया जाता है। ऐसी सज़ा से तोह यमलोक के पहरेदार भी डरते हैं। आखिर वे भी आज कल बाड़ी बिल्डिंग के लिए जिम्मिंग जो कर कर रहे हैं ;)
उम्मीद है आपको दिल्लीवालों के चटोरे होने की दुःख भरी दास्ताँ समझ आ गयी होगी। अगर अआपके दोस्त दिल्ली में रहते हैं तो अगली बार आप अपने मूह में कृपा करके टेप लगा के आईयेगा वर्ना आप हमें ही दोष देंगे।
Labels:
कुछ संदेश,
खाना,
दिल्ली,
हास्य-व्यंग
| आपके विचार |
Thursday, July 22, 2010
देखिये दुलारी बाई - जमघट थेअटर की प्रस्तुति (२४ और २५ जुलाई 2010 )
सावधान!!
कदरदान, भाईजान, अब्बाजान और पहलवान ।
इस आने वाली २४ और २५ तारिख को अपने पेट पे रस्सी बांधने की तय्यारी कर लीजिये क्यूंकि जमघट नाटक मंडली आपको ठहाके मारने पे मजबूर कर देगी। जमघट नाटक मंडली ला रही है प्रसिद्ध लेखक मणि मधुकर द्वारा रचित नाटक " दुलारी बाई " जिसका मंचन दिल्ली के अक्षरा थेअटर में शाम साढ़े सात बजे से होगा।
जादा जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें
Donor Passes are available for 300/- , 200/- & 100/-
Please contact : Priyanka : 9811656740
Hemant : 9013041054
Please contact : Priyanka : 9811656740
Hemant : 9013041054
Wednesday, June 30, 2010
गुड मार्निंग!

उसे याद कर के न दिल दुखा
जो गुज़र गया वो गुज़र गया
कहाँ लौट कर कोई आएगा
जो गुज़र गया वो गुज़र गया
नई सुबह है , नई शाम है
नया शहर है नया नाम है
जो चला गया उसे भूल जा
जो गुज़र गया वो गुज़र गया
मुझे पतझड़ की कहानियां
न सुना सुना के उदास कर
नए हादसों का पता बता
जो गुज़र गया वो गुज़र गया
यह मानने में हर्ज़ क्या है
की इस सुबह का ही इंतज़ार था
रात के ख्वाब को
ख़्वाब में ही रहने दे ज़रा
वह कल गुज़र चुका है, गुज़र जाने दे उसे
यह सुबह टकटकी लगाये बैठी है
बाँध ले इसे अपनी झोली में
दिन भर की थकान के लिए
मुस्कुरा के शुरुआत कर
अपनी हर सुबह का तू।
शुभ प्रभात!
जो गुज़र गया वो गुज़र गया
कहाँ लौट कर कोई आएगा
जो गुज़र गया वो गुज़र गया
नई सुबह है , नई शाम है
नया शहर है नया नाम है
जो चला गया उसे भूल जा
जो गुज़र गया वो गुज़र गया
मुझे पतझड़ की कहानियां
न सुना सुना के उदास कर
नए हादसों का पता बता
जो गुज़र गया वो गुज़र गया
यह मानने में हर्ज़ क्या है
की इस सुबह का ही इंतज़ार था
रात के ख्वाब को
ख़्वाब में ही रहने दे ज़रा
वह कल गुज़र चुका है, गुज़र जाने दे उसे
यह सुबह टकटकी लगाये बैठी है
बाँध ले इसे अपनी झोली में
दिन भर की थकान के लिए
मुस्कुरा के शुरुआत कर
अपनी हर सुबह का तू।
शुभ प्रभात!
photo by: http://www.flickr.com/photos/yarizu/
Labels:
कविता,
सुबह,
हिन्दी कविता
| आपके विचार |
Wednesday, June 23, 2010
इश्क की दुहाई
तराशा हुस्न ओढ़े फिरते हैं वह,
पर इश्क को आह भरने की इज़ाज़त नहीं।
पल भर में सांसें चुरा लेते हैं,
और हमें शिकायत करने की इज़ाज़त नहीं।
न जाने कब से दीवाना बना रखा है ,
पर हमें दिल लगाने की इज़ाज़त नहीं।
उनकी हसी भी एक कशिश है,
पर हमें मुस्कुराने की इज़ाज़त नहीं।
नज़रों के इशारे से सब कुछ बयां करते हैं,
और हमें हाल-ऐ-दिल सुनाने की इज़ाज़त नहीं।
ख्वाबों में आना अब उनकी आदत है,
पर हमें उनकी नींद उड़ाने की इज़ाज़त नहीं।
उसके शब्द कानों को ग़ज़ल मालूम पड़ते हैं,
पर हमें शायराना होने की इज़ाज़त नहीं।
तराशा हुस्न ओढ़े फिरते हैं वह,
पर इश्क को आह भरने की इज़ाज़त नहीं।
पर इश्क को आह भरने की इज़ाज़त नहीं।
पल भर में सांसें चुरा लेते हैं,
और हमें शिकायत करने की इज़ाज़त नहीं।
न जाने कब से दीवाना बना रखा है ,
पर हमें दिल लगाने की इज़ाज़त नहीं।
उनकी हसी भी एक कशिश है,
पर हमें मुस्कुराने की इज़ाज़त नहीं।
नज़रों के इशारे से सब कुछ बयां करते हैं,
और हमें हाल-ऐ-दिल सुनाने की इज़ाज़त नहीं।
ख्वाबों में आना अब उनकी आदत है,
पर हमें उनकी नींद उड़ाने की इज़ाज़त नहीं।
उसके शब्द कानों को ग़ज़ल मालूम पड़ते हैं,
पर हमें शायराना होने की इज़ाज़त नहीं।
तराशा हुस्न ओढ़े फिरते हैं वह,
पर इश्क को आह भरने की इज़ाज़त नहीं।
Labels:
कविता,
प्रेम,
हिन्दी कविता
| आपके विचार |
Monday, June 07, 2010
बुद्धि जीवी की जय हो

हाँ मैं बुद्धि-जीवी हूँ, पर इसमें गलती मेरी नहीं. कुछ ऐसा ही कहा मेरे एक जानकार मित्र ने जब हमारी किसी छोटी सी बात पर कहा-सुनी हो गयी।
यूँ तो बुद्धि जीवी होने में कोई बुराई नहीं पर बात यह है की बुद्धि जीवी को अक्सर लोग कुछ अलग ही नज़रिए से देखते हैं। जी हाँ, बुद्धिजीवी वे लोग हैं जिन्हें सामान्य भाषा में इंटेलेक्चुअल भी कहा जाता है। चेहरे से शुशील और सरल दिखने वाले यह लोग भेजे से टेढ़े किस्म के होते हैं जिसके कारण कभी कभी उपहास के पात्र भी बन जाते हैं। पर कभी कभी आम इंसान इनसे डर के भीचलता है, न जाने कब क्या कह बैठें और फिर बेचारा आम आदमी अपनी खोपडिया खुजाने के आलावा कुछ नहीं कर पाएगा।
पर शायद वास्तविकता तो कुछ और ही है, क्यूंकि बुद्धिजीवी भी कई प्रकार और आकर के होते हैं। एक किस्म तो उन बुद्धि जीवियों की होती है जिनके पास उधार की बुद्धि है और वे दूसरों को उस उधार की बुद्धि में से दिल खोल के बुद्धि बांटते फिरते हैं या यूँ कहें वाह वही बटोरने के लिए ज़बरदस्ती ही बुद्धि चेपते फिरते हैं।
दूसरी किस्म वे हैं जिनका जीवन बुद्धि को मोटी-मोटी किताबों और महापुरुषों के सत्संग रुपी ज्ञान द्वारा घिसने और उसको तेलपिलाने में गुज़र जाता है। ऐसे बुद्धि जीवी अपनी फौलाद सी बुद्धि का प्रयोग करके लोगों एवं समाज का उद्धार करने का प्रयत्न ही करते रहते हैं।
तीसरे वह धूर्त पापी हैं जो बुद्धि जीवियों की ही बुद्धि का जन प्रसारण करके अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं। मतलब बुद्धि-बाज़ार के सबसे बड़े थोक के भाव विक्रेता यही जनाब हैं। आय दिन बुद्धि की प्रदर्शनी भी लगाते हैं और खूब पैसा कमाते हैं।
इन तीनो को यदि एक मंच पर उतार दिया गया तो ज्ञान की गंगा, जमुना और सरस्वती एक ही मंच पे से फूट पडेंगी। पर गौर से देखा जाये तो इन सब में पिसता आम आदमी ही है। बिना बात के ज्ञान की सहस्त्र धाराओं में स्नान करना पड़ता है और कभी कभी तो न चाहते हुए डुबकी और गहरे गोते भी लगाने पड़ते है।
एक बार तो आम आदमी ने पूछ ही लिया , अरे भाई बुद्धि जीवी एक बात तो बताओ - तुम इतना सोच कैसे लेते हो? तो बुद्धिजीवी ने अपने मुख-मंडल पे विचित्र और गहरी चिंतन की रेखा खेंचते हुए विनम्र भाव से कहा की महोदय -
कलियुग में जैसे हर घर की ज़रूरत टी-वी और बीवी है,
इस समाज की ज़रूरत हम बुद्धि-जीवी है।
सोचना हमारे बाएँ हाथ का खेल है,
हमारे हर शब्द में छुपी एक रहेस्य की रेल है।
जनता जनार्दन तो आप हैं,
पर बुद्धि के मामले में हम सबके बाप हैं।
न देता कोई हमको चुनौती है,
क्यूंकि सोचना तो भाई हमारी बपोती है।
ज्ञान विज्ञानं के दर्शन भी हम कराते हैं,
पर हम फ़ोकट में किसी को नहीं पकाते हैं।
न समझना हमको किसी से भी कम,
क्यूंकि बुद्धि जीवी हैं हम, बुद्धि जीवी हैं हम, बुद्धि जीवी हैं हम।।
इस समाज की ज़रूरत हम बुद्धि-जीवी है।
सोचना हमारे बाएँ हाथ का खेल है,
हमारे हर शब्द में छुपी एक रहेस्य की रेल है।
जनता जनार्दन तो आप हैं,
पर बुद्धि के मामले में हम सबके बाप हैं।
न देता कोई हमको चुनौती है,
क्यूंकि सोचना तो भाई हमारी बपोती है।
ज्ञान विज्ञानं के दर्शन भी हम कराते हैं,
पर हम फ़ोकट में किसी को नहीं पकाते हैं।
न समझना हमको किसी से भी कम,
क्यूंकि बुद्धि जीवी हैं हम, बुद्धि जीवी हैं हम, बुद्धि जीवी हैं हम।।
वैसे तो बुद्धि जीवी के बारे में जितना भी कहो कम है, यह साधारण से काम को अपनी बुद्धि के बल पर असाधारण सा दिखा देते हैं और फिर वह काम और बात खास हो जाती है। पर प्रश्न यह है की क्या वाकई समाज को इन जैसे बुद्धि जीवियों की आवश्यकता है? मैं नहीं जानता और न ही इसके बारे में सोचना चाहता हूँ क्यूंकि सोचना तो बुद्धि जीवी का काम है। पर मेरी मानिए तो एक साधारण इंसान बल्कि हर इंसान के लिए सरल होना बहुत ज़रूरी है क्यूंकि उसी में उसका असली अस्तित्व छुपा है।
Labels:
कविता,
कुछ संदेश,
ज़िन्दगी,
जीवन सन्देश,
हा हा ही ही क्लब,
हास्य-व्यंग
| आपके विचार |
Subscribe to:
Posts (Atom)